जीवन की पाठशाला” – एक प्रेरणादायक धारावाहिक-दसवीं किश्त
जीवन की पाठशाला एक ऐसा धारावाहिक है जिसमें हर किसी को प्रवेश लेना होता है । यह धारावाहिक रोजमर्रा की ज़िंदगी में आने वाली चुनौतियों, संघर्षों और सीखों पर आधारित है । इसमें हमने ऐसे 30 टॉपिक्स को संजोया है जो हमें सत्यता से रू बरु करवाते हैं। प्रत्येक टॉपिक एक नई कहानी है , जिसमें कोई न कोई जीवन-संबंधी महत्वपूर्ण संदेश छुपा होता है । हर विषय को विभिन्न धर्मों में दिए गए सिद्धांतो के परिपेक्ष्य में भी हमने समझने की कोशिश की है।
अभी तक हम नौं टॉपिक पढ़ चुके हैं आज पढ़ते हैं दसवां टॉपिक
मनिंदर सिंह चंडोक
लेखक, कवि, मोटिवेशनल स्पीकर, ट्रेनर एवं कोच
संतोष ही सुख है: जीवन में संतोष और खुशी का संबंध।
हमारा मन जन्म से ही सुख की खोज में रहता है। वह इसे भौतिक वस्तुओं, संबंधों, पद-प्रतिष्ठा और उपलब्धियों में ढूँढता है, परन्तु जितना वह पाता है, उससे अधिक पाने की लालसा और चिंता में घिर जाता है। इसी चक्रव्यूह में वह सुख से दूर होता चला जाता है। वास्तव में सुख किसी बाहरी वस्तु या परिस्थिति में नहीं, बल्कि आंतरिक संतोष में है। यही कारण है कि संतोष को शाश्वत सुख का स्रोत कहा गया है। संतोष एक मानसिक स्थिति है, जो व्यक्ति को हर हाल में शांत, स्थिर और आनंदित बनाए रखती है।
संतोष का अर्थ है – जो कुछ हमारे पास है, उसमें प्रसन्न और पूर्ण अनुभव करना। यह कोई निष्क्रियता नहीं, बल्कि सक्रिय स्वीकृति है। संतोषी व्यक्ति न तो हर समय शिकायत करता है, न ही व्यर्थ की तुलना करता है। वह अपने कर्म करता है लेकिन परिणामों को लेकर अशांत नहीं होता। संतोष का महत्व इस बात से समझा जा सकता है कि अशांत मन करोड़ों में भी दुखी रहता है, जबकि संतोषी मन रोटी, नमक और पानी में भी आनंद पाता है।
सुख और संतोष का गहरा संबंध है। जब मन में संतोष होता है, तभी व्यक्ति को वास्तविक सुख की अनुभूति होती है। असंतोष मन में एक खालीपन उत्पन्न करता है जो हमेशा कुछ और चाहता है। यह इच्छा की अग्नि कभी नहीं बुझती। जैसे-जैसे व्यक्ति इस अग्नि को बुझाने की कोशिश करता है, वैसे-वैसे वह और जलता जाता है। इसके विपरीत, संतोष की भावना व्यक्ति को हर स्थिति में संतुलन और शांति प्रदान करती है। यही आंतरिक शांति ही सच्चे सुख का स्वरूप है।
भारतीय दर्शन और धर्म ग्रंथों ने संतोष को अत्यंत महत्वपूर्ण गुण माना है। यह न केवल व्यक्तिगत कल्याण का माध्यम है, बल्कि मोक्ष मार्ग का प्रमुख चरण भी है।
1. भगवद्गीता में संतोष:
भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कर्मयोग का उपदेश देते हुए कहा:
"योगःकर्मसु कौशलम्" – योग का अर्थ है कर्म में कुशलता, लेकिन साथ ही परिणाम को लेकर संतुलन और संतोष बनाए रखना।
एक अन्य श्लोक में कहा गया है:
"सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।"
– सुख-दुख, लाभ-हानि, जय-पराजय – इन सब में समता और संतोष की भावना ही योग है।
2. उपनिषदों में संतोष:
ईशावास्य उपनिषद का प्रसिद्ध मंत्र है:
"ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किं च जगत्यां जगत् तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥"
इसका अर्थ है – सम्पूर्ण जगत ईश्वर से व्याप्त है, अतः त्यागभाव (संतोष) के साथ भोग करो और लोभ मत करो।
3. बौद्ध धर्म में संतोष:
गौतम बुद्ध ने "तृष्णा" को दुख का मूल कारण बताया। उन्होंने कहा कि जब तक मनुष्य की इच्छाएँ बंधी रहेंगी, वह दुखी रहेगा।
अष्टांगिकमार्ग में ‘सम्यक आजीव’, ‘सम्यक विचार’ आदि के माध्यम से संतोष का अभ्यास करने की बात कही गई है।
4. जैन धर्म में संतोष:
जैन साधुओं के लिए ‘अपरिग्रह’ और ‘संयम’ अनिवार्य है। एक जैन साधु केवल आवश्यक वस्तुओं में ही संतोष पाता है और किसी भी प्रकार की भौतिक लालसा नहीं रखता।
5. सिख धर्म में संतोष:
गुरु ग्रंथ साहिब में संतोष को पांच महान गुणों में से एक माना गया है।
"संतोख थाप सरम का पव"
– संतोष वह नींव है, जिस पर मेहनत का महल खड़ा होता है।
संतोष के अभाव के दुष्परिणाम
जहाँ संतोष सुख का द्वार है, वहीं असंतोष दुखों की जड़ है। असंतोष के कई कारण हो सकते हैं
- व्यक्ति हमेशा तनावग्रस्त रहता है
- तुलना और ईर्ष्या का भाव पनपता है
- रिश्तों में खटास आती है
- मानसिक और शारीरिक रोग बढ़ते हैं
- आध्यात्मिक विकास रुक जाता है
हम अक्सर देखते हैं कि अत्यधिक अमीर और प्रसिद्ध लोग भी आत्महत्या कर लेते हैं – इसका कारण है आंतरिक संतोष का अभाव।
संतोषीजीवनकेलाभ
- शांति और मानसिक संतुलन
- स्वस्थ और सरल जीवन
- सकारात्मक सोच
- रिश्तों में मधुरता
- आध्यात्मिक प्रगति
संतोष से व्यक्ति जीवन को स्वीकार करता है, उसमें सौंदर्य देखता है और हर क्षण को पूर्णता से जीता है।
संतोषप्राप्तिकेउपाय
- कृतज्ञता का अभ्यास करें – रोज़ 3 बातें लिखें जिनके लिए आप आभारी हैं।
- तुलना बंद करें – अपने जीवन को दूसरों से न मिलाएं।
- अपेक्षाएँ कम करें – अधिक अपेक्षाएँ दुख का कारण बनती हैं।
- वर्तमान में जिएं – अतीत की चिंता और भविष्य की आशंका को छोड़ें।
- साधना और ध्यान करें – इससे मन स्थिर और शांत होता है।
- सेवा करें – दूसरों के लिए कुछ करना आंतरिक संतोष देता है।
निष्कर्ष
"संतोष ही सुख है" – यह केवल एक कहावत नहीं, बल्कि जीवन की सच्चाई है। व्यक्ति कितना भी बड़ा बन जाए, यदि उसके भीतर संतोष नहीं है, तो वह कभी भी सुखी नहीं हो सकता। धर्म, दर्शन और मनोविज्ञान – तीनों इस बात को स्वीकार करते हैं कि जो वर्तमान में, जो कुछ है उसमें प्रसन्न रहना जानता है, वही सच्चे सुख का अधिकारी है। संतोष कोई कमजोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ी ताकत है – जो इंसान को बाहर की दुनिया से नहीं, खुद से जोड़ती है।
अतः जीवन में सुख चाहते हैं, तो संतोष को अपनाइए – क्योंकि अंततः वही सच्चा सुख है।
फिर कभी मैं आपके साथ विश्व प्रसिद्ध मेसलो की थ्योरी पर बात करूँगा जो संतोष को बहुत अच्छी तरह से समझाती है