ये उदासीनता विचारणीय नहीं चिंतनीय है

उदासीनता की यदि हम व्याख्या करें तो हम कह सकते हैं अपने आप के प्रति, अपने कार्यों के प्रति निराशा का भाव होना। इस निराशा पर विचार करके उदासीनता को सजगता में परिवर्तित किया जा सकता है। पर जब विचारों का स्रोत ही कुंद हो जाए और जब हम उदासीनता को नियति के रूप में स्वीकार कर लें तब वे चिंता का विषय हो जाती है।

ये उदासीनता विचारणीय नहीं चिंतनीय है

लायंस क्लब विश्व का सबसे बड़ा सेवाभावी संगठन है। हमारे ध्येय वाक्य WE SERVE, के साथ फेलोशिप और नेतृत्व निखार इसके मूल में है। इस मूल मंत्र को केंद्र में रखकर आज लायंस संगठन अपने 108 वर्ष पूर्ण कर 109 वें वर्ष में प्रवेश की तैयारी कर कर रहा है.

अधिकांश सदस्य ख़ुद अपनी मर्जी से लायंस संगठन से जुड़ते हैं. जो दूसरों के कहने पर जुड़ते भी हैं वे या तो उसी वर्ष क्लब

छोड़ जाते हैं या फिर इसी में रच बस जाते हैं. जो लायन साथी दूसरे वर्ष की फीस जमा कर देता है वे फिर आसानी से क्लब नहीं छोड़ता है.

लायंस क्लब में प्रवेश लेकर अधिकांश का लक्ष्य स्पष्ट नहीं होता है. जिस किसी का लक्ष्य थोड़ा बहुत निर्धारित भी होता है तो वे भी क्लब के कार्यकलापों को देखकर तिरोहित हो जाता है. इस सब का बहुत बड़ा करण है हमारी लीडरशिप का मजबूत नहीं होना.

पूरे विश्व में एक सशक्त लीडरशिप को लेकर हमेशा बहस चलती रहती है. जब तक लीडर अच्छा नहीं होगा हमारा संगठन अच्छा नहीं होगा. जब तक संगठन अच्छा नहीं होगा तब तक अच्छे लोग उससे नहीं जुड़ेंगे और जब तक अच्छे लोग नहीं जुड़ेंगे तब तक उस संगठन की सार्थकता नहीं रहेगी.

कमोवेश ये स्थिति 90% क्लब्स में देखी जा रही है. लीडरशिप के अभाव में लायंस के सिद्धांत, नियम, संविधान, कोर्सेस व सेवा गतिविधियां उस तरह से लागू नहीं की जा पा रही हैं जिनकी अपेक्षा है.

क्या करण है इसका? हमें इसका कारण तो खोजना ही होगा. हम मिशन 1.5 पर कार्य कर रहे हैं. मुझे एक वरिष्ठ लायन उस दिन बता रहे थे की 1988 में भी मिशन 1.5 पर कार्य कर रहे थे. विष्णु बाजोरिया अपनी पुस्तक “माय जर्नी इन लायनिज्म” के पृष्ठ क्रमांक 96 पर लिखते हैं की 01.07.2000 को हमारी सदस्यता 1416487 जो 01.04.2009 को 1322679 रह गई है.

इसका सबसे बड़ा कारण जो मुझे समझ में आया है वे है हमारी जीवन के प्रति उदासीनता. हम जीवन में जो भी कार्य कर रहे हैं उसके प्रति हम सजग नहीं हैं. सिर्फ़ करना है तो कर रहे हैं. ज़िंदा हैं इसलिए जी रहे हैं. हम अपने प्रति बहुत उदासीन हैं. हम अपने स्वास्थ्य के प्रति, अपने व्यापार के प्रति, अपने कार्यों के प्रति, अपने रहन सहन के प्रति, अपने परिवेश के प्रति, अपने रिश्तों के प्रति अति उदासीन हैं.

अभी हाल में मुझे रीजनल लायंस लीडरशिप इंस्टिट्यूट जो रायपुर में होने जा रही है उसके लिए अनेक लायन साथियों को फ़ोन करने का मौक़ा मिला. 4500 सदस्यों के डिस्ट्रिक्ट में 10 लायन साथियों को खोज निकलना लोहे के चने चबाना जैसे हो गया. अधिकांश ने कहा की उनके पास समय नहीं है. वे किसी न किसी कार्य में व्यस्त हैं. अधिकांश ने कहा की वे उन दिनों कहाँ रहेंगे अभी तय नहीं है. कुछ ने कहा की RLLI करने से होगा क्या. जब डिस्ट्रिक्ट में कुछ अच्छा नहीं चल रहा है तो मैं RLLI करके क्या कर लूँगा. इस तरह की अनेक बातें मुझे बताई गईं.

मुझे समझ नहीं आता की ये समय की कमी का बहाना हम कब तक ओढ़े रहेंगे. न जाने हम किन कार्यों में व्यस्त हैं की समय ही नहीं है. ना जाने कौन सा पहाड़ तोड़ रहे हैं की जिसमें कुछ दिन का अन्तर आ गया तो उसे टूटने में देरी हो जाएगी. जीतन मांझी ने जिस तरह से लग कर पहाड़ तोड़ दिया था लगता है वही हम हम कर रहे हैं. न जाने किस काम में व्यस्त हैं. और तो और हम क्या करने वाले हैं ये पता ही नहीं है. हमारे पास कोई प्लान नहीं है. कोई कैलेंडर नहीं है. कोई प्रोजेक्ट नहीं है जिस में हम व्यस्त हैं.

हम सिर्फ़ नहीं जाना चाहते इसलिए नहीं जा रहे हैं. हम लायंस के विषय में नहीं जानते क्योंकि हमने जानने की कोशिश ही नहीं की इसलिए हमारी ये समझने में भी कोई रुचि नहीं है की RLLI क्या है. हम बाहरी कारकों से प्रभावित हैं. सब कह रहे हैं की डिस्ट्रिक्ट में सही काम नहीं हो रहा है इसलिए मेरी भी यही राय बन गई है. मैं इस विषय में सोचना समझाना ही नहीं चाहता हूँ.

मैं ये समझने में असमर्थ हूँ, की हम अपने आप को कब टटोलेंगे. डिस्ट्रिक्ट गवर्नर डिस्ट्रिक्ट का मुखिया होता है। वे अपनी टीम तैयार करता है। हर टीम सदस्य को कुछ न कुछ दायित्व दिया जाता है। हममें से अधिकांश तो जानते ही नहीं है की उनको क्या दायित्व दिया गया है। चूंकि हमें दिए पद के साथ हम न्याय नहीं करते हैं तो डिस्ट्रिक्ट के लक्ष अधूरे रह जाते हैं। सारा ठीकरा फूटता है डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के ऊपर।

हम अपने आप से कब पूछेंगे की हमने डिस्ट्रिक्ट के लिए क्या किया है. मैं इस बात को कब समझूंगा की जो कार्य मुझे दिया गया है वे कार्य मैं कब और कैसे करूँगा। अब RLLI का उदाहरण की ले लीजिए। यदि मुझे RLLI के लिए कहा जा रहा है तो इससे मेरे जीवन में क्या बदलाव आयेगा. मैं ऐसा कौन सा कार्य कर रहा हूँ की मैं तीन दिन का समय नहीं निकाल सकता. 8000 रू की अल्प राशि में मुझे दो रात रहने और तीन दिन चार टाइम खाने को मिल रहा है साथ ही मेरे ज्ञान में वृद्धि हो रही है तो ये घाटे का सौदा थोड़े ही है. ये ज्ञान सिर्फ़ लायंस की धरोहर थोड़े ही है, ये मेरे दैनिक जीवन में बहुत बड़ा रोल निभाएगा.

मगर मैं उदासीन हूँ. मैं दिशाहीन हूँ. मुझे अपने परिवेश से कोई सरोकार नहीं है. मेरे पास कोई कार्यक्रम नहीं है. मेरे पास कोई एजेंडा नहीं है. मैं तो हवा में उड़ा चला जा रहा हूँ.

मित्रो मुझे कम से कम 100 लायन सदस्यों से बात करके तो यही समझ आया की उदासीनता अब विचारणीय नहीं वरन् चिंतनीय हो गई है. विचार तो तब किया जाए जब कोई समझने का प्रयास करे. कोई प्रश्न पूछे. कोई जिज्ञासु हो. पर यहाँ तो मुझे उत्तर देने हेतु बाध्य किया जाता है की RLLI या अन्य इंस्टिट्यूट या लायंस पोर्टल के कोर्स मैं क्यों करूँ.

लायंस का न सही अपना ख़ुद का ख्याल करिए. दूसरों को नहीं अपने आप से सवाल करिए आप लायंस में क्या भूमिका निभा रहे हैं. आप कौन सा पहाड़ तोड़ रहे हैं. क्यों ऐसे मौकों को आप खोना चाहते हैं जहाँ सिर्फ़ और सिर्फ़ आपके व्यक्तित्व का विकास एक मात्र लक्ष्य है.

मैंने अपने जीवन में ऐसा एक भी मौक़ा आज तक नहीं छोड़ा है. मैंने अपने व्यस्ततम समय में से समय निकल कर अपने व्यक्तित्व पर ध्यान दिया है. मैंने ये सरोकार नहीं रखा है की डिस्ट्रिक्ट मेरे लिए क्या कर रहा है. मैंने हमेशा ये सोचा है की मैं डिस्ट्रिक्ट के लिए क्या कर रहा हूँ. मैंने अपने सीमित साधनों में से जो बन पड़ा है वे किया है.

लायंस का लक्ष्य सेवा के साथ फेलोशिप तो है ही, साथ ही नेतृत्व निखार भी है. यदि आप नेतृत्व करने में पीछे रह जाते हैं तो आप भीड़ का हिस्सा बन जाते हैं. लायंस संगठन भीड़ नहीं नेतृत्वकर्ताओं का संगठन बनना चाहता है. यदि आप नेतृत्व नहीं करना चाहते तो आप सेवा भी नहीं कर पाएंगे और न ही अर्थपूर्ण फेलोशिप निभा पाएंगे. शायद यही कारण है की हमारे क्लबों के पास कोई परमानेंट प्रोजेक्ट्स नहीं हैं.

उठिए, सोचिए, अपने प्रति जवाबदेही रखिए क्योंकि यदि आप अपने लिए प्रतिबद्ध नहीं रहेंगे तो फिर चाहे लायंस संगठन हो, परिवार हो, परिवेश हो, मित्र हों या देश हो हमारी उदासीनता हमें समय से पीछे कर देगी जिसका खामियाजा और किसी को नहीं अंततः हमें ही भुगतना होगा.

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January 8, 2026
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